छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक नृत्य, chhattisgarh lok nritya

  छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक नृत्य 
   1. सुआ नृत्य 

सुआ छत्तीसगढ़ में मूलतः महिलाओ और किशोरियों का नृत्य पर्व है। छत्तीसगढ़ी जनजीवन में सुआ नृत्य की लोकप्रियता सबसे अधिक है। इसमें सभी जाति वर्ग की स्त्रियां  सुआ नृत्य में हिस्सा लेती हैं। दीपावली के कुछ दिन पूर्व से ही सुआ नृत्य शुरू होता है और दीपावली कि रात्रि में शिव- गौरा विवाह के आयोजन से समापन होता हैं।इस कारण सुआ नृत्य को गौरा नृत्य भी कहा जाता है। महिलाएं अपने अपने गांवों से टोली बनाकर समीप के गांवों में जाती है और प्रत्येक घर के सामने गोलाकार झुंड बनाकर ताली कि थाप पर नृत्य करते हुए गीत गाती है। घेरे के बीच में एक युवती सिर पर लाल कपड़ा ढ़के  टोकनी लिये हुए होती है। टोकनी में धान भरकर उसमें मिट्टी के बने हुए दो तोते सजाकर रख दिए जाते है। ये दोनों तोते शिव- पार्वती (गौरा) के प्रतीक माने जाते हैं। सुआ नृत्य करते समय टोकनी को बीच में रख दिया जाता है और लाल लाल कपड़ा को हटाकर तोते को खुले कर दिए जाते है। फिर महिलाएं सामूहिक स्वर में सुआ गीत गाती हुई वृत्ताकार में झुक झुक कर ताली बजाते हुए नृत्य करती हैं।कभी – कभी सुआ गीत में प्रशन – उत्तर भी अपनाई जाती है।सुआ प्रेम का गीत नृत्य है।सुआ गीत में किशोरिया अपने प्रेमी  को सुआ के माध्यम से संदेश भेजती है।धान कटाई के बाद सुआ नृत्य उत्तरी एवं मध्य छत्तीसगढ़ में अत्यधिक उमंग और उल्लास के साथ किया जाता है। सुआ नृत्य में जितनी नृत्य की केंद्रीयता है उतना ही सुआ गीत भी महत्वपूर्ण है।सुआ गीत की पारम्परिक लोक धुन अत्यन्त मधुर और प्रभावकारी हैं।सुआ गीत नारी जीवन की समस्त सुख दुःख और प्रेम- धान करूणा के गीत है।

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  2. चेंदनी 

लोचंदा के नाम से ख्यात चंदेनी छत्तीसगढ़ में दो शैलियों में पाया जाता है।एक लोक कथा के रूप में तथा दूसरा गीत- नृत्य के रूप में। पुरुष पात्र विशेष वेश- भूषा में नृत्य के साथ चंदेनी कथा प्रस्तुत करता है। नृत्य- गीत रात भर चलता है। बीच- बीच में विदूषक जलती मशाल से करतब दिखता है। चंदेनी नृत्य में टिमकी, ढोलक आदि की संगत परंपरागत है। लोरिक चंदा मूलतः प्रेमगाथा है।

    3. राउत नाचा 
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राउत नाचा राउत समुदाय का नृत्य है। यह दीपावली के अवसर पर किया जाने वाला एक परंपरागत नृत्य राउत नाचा है।इस नृत्य में लोग विशेष वेशभूषा पहनकर हाथ में सजी हुई लकड़ी लेकर टोली में गाते और नाचते हुए निकलते है।गांव में प्रत्येक घर के मालिक को आशीर्वाद देते है। टिमकी, ढोलक, सिंग बाजा आदि इस नृत्य के प्रमुख वाध है। नृत्य के पहले दोहे गए जाते हैं। दोहे श्रृंगार, प्रेम, हास्य, तथा पौराणिक सन्दर्भो को लिए हुए होते है।

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   4. पंथी नाचा 
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छत्तीसगढ़ की सतनामी जाति का पारंपरिक नृत्य पंथी है।इस नृत्य में लोग विशेष वेश- भूषा पहनते हैं। किसी तिथि त्योहार पर सतनामी जाति के लोग जैतखाम की स्थापना करते हैं और परम्परागत ढ़ंग से नाचते और गाते है। पंथी नृत्य की शुरुआत देवताओं की स्तुति से होती है। पंथी गीतो का प्रमुख विषय गुरु घासीदास का चरित्र होता है।इस नृत्य में आध्यात्मिक सन्देश के साथ मानव जीवन की महत्ता भी होती है। गुरु घासीदास के पंथ से पंथी नृत्य का नामकरण हुआ है पंथी नृत्य के प्रमुख वाध मांदर एवं झांझ होते हैं।इस नृत्य में मुख्य नर्तक पहले गीत की कड़ी उठाता है जिसे अन्य नर्तक दोहराते हुए नाचते है। नृत्य का आरम्भ धीमी गति से होता है पर जैसे जैसे गीत और मृदंग की लय तेज होती है। वैसे-वैसे पंथी नर्तकों की आंगिक चेष्ठाएं तेज होती जाती है और समापन तीव्र गति के साथ चरम पर होता है। वस्तुतः यह अत्यंत द्रुत गति का नृत्य है। इसमें गति और लय का अद्भुत समन्वय होता है।इस नृत्य की तेज, नर्तकों की तेजी से बदलती मुद्राएं एवं देहगती दर्शकों को आश्चर्य चकित कर देती हैं।इस नृत्य को देवदास बंजारे एवं उसके साथियों में देश- विदेश में काफी प्रतिष्ठित किया है। 

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   5. करमा नृत्य 
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करमा नृत्य की परम्परा भारत की नई जनजातियों में देखने को मिलती है।छत्तीसगढ़ में गोड़, बैगा, कमार, कवर, उरांव, पंडो, बिंझवार, बिरहोर आदि जनजातियों में करमा नृत्य किया जाता है। करमा नृत्य गीत कर्म देवता को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। करमा नृत्य गीतो में आदिवासियों के प्रेम, श्रृंगार के साथ प्रत्येक गतिविधियों की सम सामयिक समग्र अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। करमा मूलतः मुंडा और उरांव जनजाति का आदिम नृत्य है। करमा का विस्तार बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर, नारायणपुर एवं बीजापुर जिलों को छोड़कर राज्य के सभी जिलों तक है। करमा कही पुरुष परक और कही स्त्री पुरुष के समान भागीदारी का नृत्य है। जनजातियों के साथ- साथ अन्य जातियों तथा देवार, ढीमर, कुर्मी आदि जातियों में भी करमा नृत्य किया जाता है। करमा सर्वाग सुंदर नृत्य है। करमा का केन्द्रीय वाद्य मांदर है। बिंझवार जनजाति के लोग वर्षा के प्रारम्भ एवं समाप्ति पर करमा नृत्य करते हैं, जबकि बैगा जनजाति के लोग कभी भी यह नृत्य कर लेते हैं। प्राय: यह विजयदशमी से प्रारंभ होकर अगली वर्षा ऋतू के आरंभ तक चलता है। इसे खेतिहर संस्कृति के जीवन चक्र का हिस्सा कहा जा सकता है।इस नृत्य में प्राय: 8 पुरुष और 8 स्त्रियां भाग लेती है। युवक और युवतियां गोलार्ध बनाकर आमने- सामने खड़े हो जाते हैं।एक दल गीत कि कड़ी उठता है जबकि दूसरा दल उसे दोहराता है । नृत्य में युवक- यूवती आगे- पीछे चलने में एक दूसरे के अंगुठे को छूने की कोशिश करते हैं।

  6. सैला नृत्य 
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सैला शुद्धत: जन जातियां नृत्य है।यह नृत्य आपसी प्रेम एवं भाई- चारे का प्रतीक है।सैला का अर्थ शैल या डंडा होता है।शैल- शिखरों पर रहने वाले लोगों द्वारा किए जाने के कारण इसका नाम शैला (सैला) पड़ा।यह नृत्य दशहरे में आरंभ होकर सम्पूर्ण शरद ऋतू की रातों तक चलता है इस नृत्य का आयोजन अपने आदि देव को करने हेतु किया जाता है। नृत्य का आयोजन चांदनी रातों में किया जाता है।सैला नृत्य फ़सल कटने के बाद छत्तीसगढ़ के अधिकांश भाग में देखा जा सकता है।सैला नृत्य को डंडा नाचा के नाम से भी जाना जाता है।यह नृत्य मूलतः पुरुषों द्वारा किया जाता है। इसमें नर्तक सादी वेशभूषा में हाथों में डंडा लेकर एवं पैरो में घुघरू बांध कर गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं।इस अवसर पर दोहे भी बोले जाते हैं ।सैला नृत्य की परिणति सर्प नृत्य के रूप में होती है। मांदर इस नृत्य का मुख्य वाद्य होता है। ग्रामों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने में सैला नृत्य की अहम भूमिका है।इस नृत्य का पुराना नाम सैला- रीना है।

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   7. परधोनी नृत्य 
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यह बैगा जनजाति का विवाह नृत्य है। बारात की अगवानी के समय खटिया, कम्बल, सूप, आदि से हाथी बनाकर नचाया जाता है। हाथी पर समधी को बैठाकर गाते हुए नाचने की परम्परा है। हाथी के आगे दुल्हन होती है।इस नृत्य का मुख्य वाद्य नगाड़ा एवं टिमकी है।

 8. बिलमा नृत्य 
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बिलमा का अर्थ है मिलन स्थान अर्थात घुलना- मिलना है। यह गोड़ एवं बैगा जनजातियों का एक लोकप्रिय नृत्य है।इस नृत्य का आयोजन दशहरा के अवसर पर होता है। इसमें स्त्री एवं पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं। यह नृत्य प्राय: शीत ऋतु में आयोजित होता है। एक गांव के युवक युवतीयां अलग – अलग समूह बनाकर दूसरे गांव मी नृत्य करने के लिए जाते हैं। बिलमा में प्राय: अविवाहित लड़कियां विशेष सजधज कर हिस्सा लेती है। ये युवतियां नृत्य करते करते अपने जीवन साथी का चुनाव भी कर लेती है।इस प्रकार ये बिलमा के अर्थ को सार्थक बनाते है।इस नृत्य का मुख्य वाद्य मांदर है।

   9. फाग नृत्य 
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इस नृत्य का आयोजन गोड़ एवं बैगा जनजातियों द्वारा होली के अवसर पर किया जाता है। इसमें गांव के सभी युवक युवतियां तथा प्रोढ़ आदिवासी लोग अति उल्लास के साथ हिस्सा लेते हैं। इस समूहिक नृत्य में एक या दो व्यक्ति लकड़ी के मुखौटे और हाथ में लकड़ी की चिड़िया आदि नचा- नचाकर भरपूर मनोरंजन करते हैं।इस नृत्य में मांदर, टिमकी आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है।

   10. थापटी नृत्य 
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यह कोरकू जनजातियों का परम्परागत लोकप्रिय नृत्य है ।इस नृत्य में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं।  चैत्र – बैशाख में कोरकू स्त्री- पुरुष यह सामूहिक नृत्य करते हैं। पुरुष हाथ में पंचा और महिला अपने दोनों हाथों में चिटकोरा बजाते हुए नृत्य करते हैं।इस नृत्य का मुख्य वाद्य ढोलक और बांसुरी है।इस नृत्य में गोलाकार परिक्रमा करते हुए दाएं- बाए झुक कर नृत्य किया जाता है। गीतों की कड़ियों के साथ नर्तकों कि पद गति और हाथों के हाव भाव थापटी नृत्य को मोहकता प्रदान करते हैं। ग्राम मल्हारगढ़ खंडवा के मोजीलाला कोरकू ने इस नृत्य को प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

11. ककसार नृत्य 
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यह बस्तर की मुरिया जनजाति का लोकप्रिय पारम्परिक नृत्य है। यह एक मूलतः जात्रा नृत्य है।गांव के धार्मिक स्थल मुरिया आदिवासी वर्ष में एक बार ककसार यात्रा पर पूजा का आयोजन करते हैं। लिंगोपेन को प्रसन्न करने के लिए युवक और युवतियां अपनी साज- सज्जा करके सम्पूर्ण रात नृत्य- गायन करते हैं। पुरुष कमर में घंटी बांधते है जबकि स्त्रियां सिर पर विभिन्न फूलों और मोतियों की मालाए पहनती हैं। 

12. गेंडी नृत्य 

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यह बस्तर की मुरिया जनजाति का एक विशेष नृत्य है। इसमें बांस कि बनी गेंडी चढकर नृत्य किया जाता है। यह एक पुरुष नृत्य है। इसमें दो नर्तक टिमकी बजाते हैं और उनको घेरकर 8-10 युवक या इससे भी अधिक गेंडी पर चढकर लय गति के साथ नृत्य करते हैं।इस नृत्य में कोई गीत नहीं गाया जाता है।गेंडी के बांसो के सहारे नर्तक कई तरह की आकर्षक और कठिन मुद्राएं संयोजित करते हैं। यह पूरी तरह से संतुलन का नृत्य है।

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    13. गंवर नृत्य
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यह बस्तर की माडिया जनजाति का अत्यंत लोकप्रिय नृत्य हैं। प्रसिद्ध मानव शास्त्री वेरीयर एल्विन ने गंवर नृत्य को विश्व का सबसे सुंदर के रूप में निरूपित किया है।इस नृत्य के समय मांडिया युवक गंवर नामक जंगली पशु और कोड़ियो से सुसज्जित मुकुट अपने सिर पर पहनते है।इस कारण इस नृत्य को गंवर नृत्य कहा जाता है।इस नृत्य में युवतियां सिर पर पीतल का मुकुट और हाथ में लोहे छड़ रखती है। युवतियां तीव्र स्वर मर गाती हुई नृत्य करती है और विभिन्न प्रकार की सुंदर मुद्राएं बनाती है।इस नृत्य में युवतियों का अलग घेरा होता है और युवकों का अलग। नृत्य के दौरान युवतियां सर्प के समान घेरा बनाकर युवकों के घेरे को पार करती है। माडिया युवक नृत्य के दौरान बाइसन हार्न कि कई भंगिमाएं बनाने की कोशिश करते हैं। यह नृत्य वर्षा काल की अच्छी फ़सल और सुख सम्पन्नता को केंद्र में रखकर किया जाता है। सम्पूर्ण गांव इस समय आमोदमग्न होता है।

  14. दोरला नृत्य 
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दोरला बस्तर में पायी जाने वाली एक जनजाति है। इसी जनजाति के नाम पर इस नृत्य का यह नाम पड़ा है।दोरला जनजाति अपने विभिन्न पर्व त्यौहार विवाह आदि अवसरों पर इस पारम्परिक नृत्य का आयोजन करती है। विवाह में पेंहुल नृत्य करने की परिपाटी है।इस नृत्य में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं। पुरुष पंचे, कुसमा एवं रुमाल पहनते है जबकि स्त्रियां रहके और बट्टा पहनती हैं।इस नृत्य का मुख्य वाद्य एक विशेष प्रकार का ढोल होता है। बस्तर में भतरा, परजा एवं धुरवा जनजातियों में भी यह पारम्परिक नृत्य देखने को मिलता है।

15. सरहुल नृत्य
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यह उरांव और मुंडा जनजातियों का आनूष्ठा निक नृत्य है ।उरांव जनजाति के लोग वर्ष मे चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन साल वृ।   की पूजा का आयोजन करते हैं और उसके आस- पास नृत्य करते हैं। सरहुल एक सामूहिक नृत्य है। इसमें युवक युवती तथा प्रोढ़ सभी अत्यन्त उमंग और उल्लास के साथ भाग लेते हैं।इस नृत्य में पुरुष विशेष प्रकार का पीला साफा बांधते हैं जबकि महिलाएं अपने जूडो में बगुले के पंख की कलगी लगाती है।इस नृत्य में पद- संचालन वाद्य की तल पर नहीं बल्कि गीतों की लय और तोड़ पर होता है।इस नृत्य का मुख्य वाद्य मांदर एवं झांझ होता है।

   16. कोल दहका नृत्य 
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यह कोल जनजाति का पारम्परिक नृत्य है। इसे कोलहाई नाच भी कहते हैं। यह सरगुजा जिले के कोल जनजाति में प्रचलित है।इस नृत्य में पुरुष गायक और वादक दोनों की भूमिका निभाता है। इसमें महिलाएं भी गाती है। गीत सावल जवाब शैली में होता है। महिलाएं सादी वेश भूषा में नाचती है और साथ साथ गाती भी है। महिलाएं के चेहरे पर घूंघट होता है।इस नृत्य के केंद्र महिलाओ का नृत्य तथा पुरुषों का ढोल वादन होता है।इस नृत्य में उसे 6 तक ढोल तीव्रता के साथ बजाई जाती है। झांझ कि झंकार नृत्य को मधुरता प्रदान करती है। महिलाएं पैरों कि गति के साथ हाथों कि अंगुलियों को नचाते हुए नृत्य करती है। नृत्य करते समय वे कमर तक झुकती है। सम पर खड़ी होकर गोल घूमती है। ढोलक की गति जितनी तेज होती है नृत्य उतना ही तेज होता है।

  17. दशहरा नृत्य 
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बैगा जनजाति यद्यपि दशहरा त्यौहार नहीं मनाते हैं किन्तु विजयदशमी से प्रारंभ होने के कारण इस नृत्य का नाम दशहरा पड़ा।इस नृत्य को बैगा जनजातियों का आदि नृत्य कहा जाता है यह नृत्य अन्य नृत्यों का द्वार है।दशहरा नृत्य एक तरह से बैगा जनजातियों में सामाजिक व्यवहार की कलात्मक सम्पूर्ति  है। यह नृत्य सैला नृत्य का एक सरल रूप है।

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     18. अटारी नृत्य 
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यह बघेलखंड के भूमिया आदिवासीयो का प्रमुख नृत्य है। यह नृत्य वर्तुलाकार होता है। एक पुरुष के कंधे पर दो आदमी आरूढ़ होते हैं।एक व्यक्ति ताली बजाते हुए भीतर- बाहर आता जाता रहता है। इसमें वादक पाश्र्व में रहते हैं।

19. हुलकी नृत्य
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हुलकी पाटा नृत्य का प्रचलन मुरिया जनजातियों में है। इसमें नृत्य के गीत विशेष आकर्षण रखते हैं।इस नृत्य में युवक और युवतियां दोनों ही हिस्सा लेते हैं। इसमें यह गाया जाता है कि राजा रानी कैसे रहते हैं? अन्य गीतों में युवक और युवतियो कि शारीरिक संरचना के प्रति सवाल जवाब होते है। यह नृत्य किसी समय से नहीं बंधा होता है। इसका आयोजन किसी भी समय किया जा सकता है।

    20. ढांढल नृत्य 
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यह नृत्य कोरकू जनजाति में प्रचलित है। इसमें नृत्य के साथ श्रृंगार गीत भी गाए जाते हैं। इसमें नृत्य करते समय एक दूसरे पर छोटे-छोटे डंडों से प्रहार किया जाता है। यह नृत्य ज्येष्ठ- आषाढ की रातों में आयोजित किया जाता है।इस नृत्य में दोलक, टिमकी, बांसुरी, मृदंग आदि बाद्य – यंत्रों का प्रयोग होता हैं। इन वाद्य यंत्रों के वादन कि गति नृत्य की गति को नियंत्रित करती है।

21. राई नृत्य 
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बुंदेलखंड का यह नृत्य किसी ऋतू विशेष या अनुष्ठान से नहीं जुड़ा हुआ है। इसे न ही मंचीय नृत्य के रूप में सीमित किया गया है। ग्रामीणों क्षेत्रो में बच्चे के जन्म, विवाह आदि अवसरों पर अथवा इच्छित कार्य की पूर्ति होने या मनोती पूरी होने पर राई नृत्य का आयोजन किया जाता है। राई नृत्य के के केंद्र में एक नर्तकी होती है,किसी। बेड़नी कहते हैं। उसे गति देने का कार्य एक मृदंग वादक करता है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि राई के विराम काल में स्वांग का आयोजन होता है, जिसमे घटनाओं स्थितियों पर त्वरित व्यंग्य एवं सामाजिक विद्रूपताओं पर चोट की जाती है। बुंदेलखंड की तरह ही बुंदेलखंड में भी राई नृत्य का प्रचलन है किन्तु दोनों क्षेत्रो की राई में बहुत अंतर है। बधेल खंड में राई विशेषकर अहीरों द्वारा कि जाती है जबकि कही- कही ब्राम्हण स्त्रियों और पुत्र जन्म के अवसर पर वैश्य द्वारा भी यह नृत्य किया जाता है। यहां के राई गीत श्रृंगार परक होते हैं। किन्तु बुंदेलखंड की तरह यौवन व श्रृंगार का अहम आवेग और तीव्र गति यहां नहीं देखने को मिलता है।

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🙏 जय जोहार जय छत्तीसगढ़ 🙏

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