चार हजार साल पुरानी कब्रगाह,करकाभाटा, बालोद छत्तीसगढ़ karkabhat balod chhattisgarh

  कब्रगाह, करकाभाटा, बालोद

पता – यह कब्रगाह बालोद जिले के करकाभाटा ग्राम के निकट धमतरी- बालोद रोड पर स्थित है।

दूरी – करकाभाटा बालोद से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

पुरानी कब्रगाह – यह कब्रगाह चार हजार साल पुरानी कब्रगाह।

महापाषाणीय अवशेष – यहां पर सड़क के दोनों ओर महापाषाणीय अवशेष स्थल है।

पुरातात्विक अवशेष – 10 किलोमीटर की परिधि में फैले है पांच हजार साल वर्ष पुरानी महापाषाण युगीन पुरातात्विक अवशेष  है।

हाइटेक कब्रे – आदिकाल काल में बनाई गई थी हाइटेक कब्रे जो आज भी सुरक्षित हैं।

सर्वे में घोषित – 18 साल पहले सर्वे में घोषित किए गए थे इस दुर्लभ स्थल को 1999 में सर्वे के दौरान ग्राम करकाभाट, करहिभदर, चिरचारी, बरही, बरपारा, कपरमेटा, धनोरा, सोरर, मुजगहन, धोबनपुरी में हुआ था सर्वे।

प्राकृतिक शैलाश्रय – महापाषाणीय स्थल के पास कम ऊंचे प्राकृतिक शैलाश्रय भी बहुत संख्या में विद्यमान है।

अनसुलझा कब्र – अब तक भी पुरातत्व विभाग भी इन कब्र के अनसुलझे रहस्य को सुलझाने में असफल है।

रहस्य से भरा है यह कब्रगाह –  सूरज की रौशनी पत्थर पर पड़ने पर मरने वाले की उम्र व समय बता दिया करता है।

कब्रो को किया चिन्हांकित – 5 हजार प्राचीन कब्रो को चिन्हांकित किया गया था।

खुदाई के दौरान – कब्र के खुदाई के दौरान लोहे के औजार, तांबे की चूड़ियां, तीर का भाग, गंडासे और पत्थरो के नुकीले
औजार भी मिले हुए हैं।

कब्रगाह के अंदर – कब्र की भीतरी भाग में चट्टान का समतल तह पर अनेक गोलाकार छोटे बड़े गड़ढे लोबान एवं कोयला भी मिला है।

कब्र की उत्तरी भाग में – विशाल चट्टानों को काटकर इस तरह खड़ा किया गया है कि मानों कोई आकृति दूर से परिलक्षित होते हैं।

स्मारकों का निर्माण – करकाभाट के महापाषाण स्मारकों का निर्माण काल लगभग एक हजार वर्ष ईसा पूर्व माना गया है।

विदेश में भी कुछ ऎसा ही कब्र –  जैसे बस्तर, नागालैंड, मणिपुर व अफ़गानिस्तान के कुछ हिस्सों में भी ऎसे ही कब्र है देखने को मिलती है।

अब तक अनसुलझा है इस कब्र का रहस्य –
हर कब्र समूह की लंबाई उत्तर-दक्षिण और चौड़ाई पश्चिम पूर्व की ओर है। दो कब्रो का एक साथ होना पति पत्नी की कब्र होने का संकेत देते हैं। ऐसी कब्र भी पाई गई है जिनमें 20 से 24 लोगों को एक साथ दफनाया गया है। कब्र के ऊपर ढेरों छोटे छोटे पत्थर रखे गए हैं। उन पत्थरों के मध्य एक विशाल पत्थर है, जिससे कब्र को ढका गया है। यहां उस जमाने की परंपरा और कारीगरी यह है कि इनमें एक डिग्री का भी फर्क नहीं है। यह पत्थर ऐसे अंश में रखे गए यहां आने हैं जिसे मैग्नेटिक नॉर्थ साउथ किरणें पास होती है जो क्रबग्राह पत्थर जितने अंश जिस दिशा पूर्व या पश्चिम में झुका हुआ है वह उस कब्र के व्यक्ति के मरने का समय व क्षेत्र में माह स्पष्ट करता है। यह वही राज है जिसे पुरातत्व विभाग 1991 के बाद से आज तक इस कब्र को सुलझाने में नाकाम रहा है।

5 हजार साल पहले कब्र को बनाने का रहस्य –
प्रथम स्तर के वृत्तो का निर्माण हो जाने के बाद पीली और लालरंग कि सिल्ट से बोल्डर ढंक दिए जाते थे। भराव करने के बाद पुनः यह प्रक्रिया दुहराई जाती थी।इच्छित ऊंचाई प्राप्त होते तक भराव कार्य किया जाता था। अधिकांश मेनहिर मछली के आकार के होते थे उनका अंतिम सिरा कभी सपाट अथवा कभी नुकीला या तिकोना बनाते थे।

उन्हें इस तरह से गाड़ दिया जाता था कि उनका तराशा हुआ समतल भाग उत्तर की ओर एवं अनगढ भाग दक्षिण की ओर रहे।वे एक सीध में या तो उत्तर दक्षिण में या फिर पूर्व पश्चिम की ओर गाड़े जाते थे। श्री ए. के शर्मा के अनुसार एक विशाल मेनहिर कि खोज सर्वधिक उल्लेखनीय हैं।

तिरछे खड़े हुए मानव मुख के आकार में तराशा गया है), की खोज सर्वाधिक उल्लेखनीय है। कैर्न के ढेर के ऊपर उपलब्ध यह मेनहिर 2.57 मीटर ऊँचा एवं 1.91 मीटर चौड़ा है। यह एकदम उत्तर-दक्षिण दिशा की सीध में स्थापित किया गया है। इसमें चौड़ा मस्तक लम्बी नुकीली नाक, ऊपरी ओष्ठ, नीचे के ओष्ठ एवं गुड्डी युक्त मुखाकृति के ऊपर गुम्बदाकार उभार है।

छत्तीसगढ़ में विशेषकर बालोद जिले में अवस्थित महापाषाणीय स्मारक अवशेषों को मेनहिर, कैर्न, प्रस्तर निर्मित वृत्त, सिष्ट, डोलमेन, केपस् अभिलेखों/रिकार्ड से जानकारी के आधार पर नवापारा से लेकर भुजगहन तक महापाषाणीय स्थल विशेष कर मेनहिर 19 वीं शताब्दी तक विद्यमान थे किन्तु ठेकेदारों द्वारा कराए गए खुदाई कार्य एवं पत्थर तुड़वाने के कारण ये महापाषाणीय स्मारक विनष्ठ हो गए हैं।

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