पितृपक्ष क्या है l what is Pitru Paksha। When is Pitru Paksha.

नोट – हिंदी और इंग्लिश में जानकारी प्राप्त करे।

हैलो दोस्तो मेरा नाम है हितेश कुमार इस पोस्ट मैं आपको पितृपक्ष क्या है जिसके बारे में जानकारी देने वाला हूं।।यह जानकारी अच्छा लगे तो कमेंट और शेयर जरूर करे आइए जानते है पितृपक्ष के बारे में विस्तार से।

पितृपक्ष क्या है

पितृपक्ष कब है – दोस्तो भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से सोलह दिवसीय श्राद्ध प्रारंभ होते हैं इस वर्ष 2021 में पितृपक्ष 20 सितंबर से श्राद्ध की शुरुआत हो रही है और यह आश्विन महीने की अमावस्या को यानि 6 अक्टूबर, दिन बुधवार को समाप्त होंगे।

पितृपक्ष क्यों मनाया जाता है- दोस्तो पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। श्राद्ध को महालय या पितृपक्ष के नाम से भी जाना जाता है।

पितृपक्ष किसे कहते हैं – दोस्तो भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथि को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। इन्हे ही पितृपक्ष कहते है।

श्राद्ध शब्द का अर्थ – दोस्तों श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है, जिसका मतलब है पितरों के प्रति श्रद्धा भाव। पद्त हमारे भीतर प्रवाहित रक्त में हमारे पितरों के अंश हैं, जिसके कारण हम उनके ऋणी होते हैं और यही ऋण उतारने के लिए श्राद्ध कर्म किये जाते हैं।

पितृलोक की प्राचीन कथा – दोस्तों पितृपक्ष में पितृ का श्राद्ध और तर्पण करना जरूरी माना जाता है। पितृलोक की प्राचीन कथा पितृपक्ष में सुने सभी पितृ खुश होंगे, उनको मोक्ष मिलेगा एवं पितृदोष से मुक्ति मिलेगी। यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता तो उसे पितृ का श्राप लगता है।

लेकिन शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध करने के बाद जितना जरूरी भांजे और ब्राह्मण को भोजन कराना होता है, उतना ही जरूरी कौवों को भोजन कराना होता है। माना जाता है कि कौवे इस समय में हमारे पितृ का रूप धारण करके पृथ्वीं पर उपस्थित रहते हैं। पितृ अपनी संतानों को परेशान नहीं करना चाहते | संतान के द्वारा श्राद्धकर्म और पिंडदान आदि करने पर उन्हें तृप्ति मिलती है, पितृ श्रद्धा भाव से किए गए श्राद्ध के खुशी के साथ स्वीकारते हैं। जानते हैं पितृ पक्ष की कथा कहानी जिसमे पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं ।

श्राद्ध की महिमा एवं विधि का वर्णन – दोस्तों विष्णु, वायु, वराह, मत्स्य आदि पुराणों एवं महाभारत, मनुस्मृति आदि शास्त्रों में यथास्थान किया गया है। पितृपक्ष के दौरान शुभ कार्य जैसे विवाह, गृहप्रवेश आदि से बचना चाहिए।पितृपक्ष में लहसुन और प्याज से बना भोजन करने से बचें शास्त्रों के मुताबिक, पितृपक्ष की 15 दिन की अवधि में पितृ किसी भी रूप में आपके घर आ सकते हैं पितृपक्ष में कुछ चीजों को खाने से सख्त परहेज करना चाहिए. श्राद्ध पक्ष में पशु-पक्षियों को दाना और जल देने से विशेष तरह के फल प्राप्त होते हैं.

पितृ पक्ष इन चीजों सेवन न करे – दोस्तों पितृ पक्ष में कुछ चीजों को खाना वर्जित माना जाता है जैसे चना, मसूर, जीरा आदि. – मांस, मछली और शराब का सेवन बिलकुल न करें।

श्राद्ध पक्ष के दौरान तिल का इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है, श्राद्ध में मांस-मछली नहीं खाना चाहिए इससे पितृ नाराज हो जाते हैं. इसलिए पितरों का श्राद्ध करने वाले को सादा और सात्विक भोजन करना चाहिए. पितृपक्ष में प्याज-लहसुन भी वर्जित है, इसलिए तर्पन करने वाले को इन दिनों बिना प्याज लहसुन का खाना खाना चाहिए. इसके साथ तर्पण करने वाले को बासी खाना नहीं खाना चाहिए, हिन्दू धर्म में तीन प्रकार के ऋण के बारे में बताया गया है, देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इन तीनों ऋण में पितृ पक्ष या श्राद्ध का महत्व इसलिए है क्यों की पितृ ऋण सबसे बड़ा ऋण माना गया है। शास्त्रों में पितृ ऋण से मुक्ति के लिए यानि श्राद्ध कर्म का वर्णन किया गया है। लेकिन आपको मालूम है कि हिंदू धर्म में सबसे पहले श्राद्ध की कर्म विधि किसने की थी।

महाभारत काल से श्राद्ध विधि का वर्णन – दोस्तों महाभारत काल के समय भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध के संबंध में कई ऐसी बातें बताई है, जो वर्तमान समय में बहुत कम लोग जानते हैं महाभारत में ये भी बताया गया है कि श्राद्ध की परंपरा कैसे शुरू हुई आज हम आपको श्राद्ध से संबंधित कुछ ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं- महर्षि निमि ने शुरू किया था महाभारत के अनुसार, सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमि को महातपस्वी अत्रि मुनि ने दिया था। इस प्रकार पहले निमि ने श्राद्ध का आरंभ किया, उसके बाद अन्य महर्षि भी श्राद्ध करने लगे। धीरे-धीरे चारों वर्गों के लोग श्राद्ध में पितरों को अन्न देने लगे। लगातार श्राद्ध का भोजन करते-करते देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए। पितरों को हो गया था अजीर्ण रोग श्राद्ध का भोजन लगातार करने से पितरों को अजीर्ण (भोजन न पचना) रोग हो गया और इससे उन्हें कष्ट होने लगा। तब वे ब्रह्माजी के पास गए और उनसे कहा कि श्राद्ध का अन्न खाते-खाते हमें अजीर्ण रोग हो गया है, इससे हमें कष्ट हो रहा है, आप हमारा कल्याण कीजिए। पहले पिता को देते है पिंड महाभारत के अनुसार, अग्नि में हवन करने के बाद जो पितरों के निमित्त पिंडदान दिया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस भी दूषित नहीं करते। श्राद्ध में अग्निदेव को उपस्थित देखकर राक्षस वहां से भाग जाते हैं। सबसे पहले पिता को, उनके बाद दादा को उसके बाद परदादा को पिंड देना चाहिए। यही श्राद्ध की विधि है। प्रत्येक पिंड देते समय एकाग्रचित्त होकर गायत्री मंत्र का जाप तथा सोमाय पितृमते स्वाहा का उच्चारण करना चाहिए। महालया अमावस्या हर साल भद्रपद • शुक्लपक्ष पूर्णिमा से लेकर अश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहा जाता है। पितृ पक्ष या श्राद्ध के अंतिम दिन को सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जाना जाता है। ऐसे करना चाहिए पिंडदान महाभारत के अनुसार श्राद्ध में जो तीन पिंडों का विधान है, उनमें से पहला जल में डाल देना चाहिए। दूसरा पिंड की अग्नि में छोड़ देना चाहिए, यही श्राद्ध का विधान है। जो इसका पालन करता है उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त और संतुष्ट रहते हैं ।

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जय जोहार जय छत्तीसगढ़

Hello friends, my name is Hitesh Kumar, in this post I am going to give you information about what is Pitru Paksha.

what is Pitru Paksha.

When is Pitru Paksha – Friends, sixteen days Shradh starts from the full moon of Bhadrapada Shukla Paksha, this year in 2021 Pitru Paksha is starting from 20th September and it will end on the new moon day of Ashwin month i.e. 6th October, Wednesday.

Why Pitru Paksha is celebrated – Friends, in Pitru Paksha, tarpan is performed for the ancestors of father’s side up to three generations and mother’s side up to three generations. These are called ancestors. Shradh is also known as Mahalaya or Pitru Paksha.

What is called Pitru Paksha – Friends, the sixteen days from Bhadrapada Purnima to Ashwin Krishna Paksha Amavasya are called Pitru Paksha. On the date on which the parents die, their Shradh is performed on Pitru Paksha. These are called Pitru Paksha.

Meaning of the word Shradh – Friends, the word Shradh is derived from Shraddha, which means reverence for the ancestors. Padhas are the parts of our ancestors in the blood flowing within us, due to which we are indebted to them and to pay off this debt, Shradh Karma is performed.

Ancient story of Pitrulok – Friends, it is considered necessary to perform Shradh and Tarpan of Pitru during Pitru Paksha. Hearing the ancient story of Pitrulok in Pitru Paksha, all the ancestors will be happy, they will get salvation and will get freedom from Pitru Dosh. If a person does not do this, then he is cursed by the father.

But according to the scriptures, after performing Shradh, as much as it is necessary to feed the nephews and Brahmins, it is equally important to feed the crows. It is believed that crows take the form of our ancestors and remain present on the earth during this time. Fathers do not want to disturb their children. They get satisfaction when the children perform Shradh and Pind Daan etc. The ancestors accept with pleasure the Shradh performed with reverence. Know the story of Pitru Paksha, in which Pitru is pleased and blesses.

The description of the glory and method of Shradh – Friends Vishnu, Vayu, Varaha, Matsya etc. Puranas and Mahabharata, Manusmriti etc. have been given in the same place. Auspicious work like marriage, home entry etc. should be avoided during Pitru Paksha. According to scriptures, avoid eating food made of garlic and onion during Pitru Paksha.During the period of 15 days of Pitru Paksha, Pitru can come to your house in any form, it should be strictly avoided to eat some things during Pitru Paksha. Special fruits are obtained by giving grains and water to animals and birds during Shradh Paksha.

Pitru Paksha should not consume these things – Friends, eating some things in Pitru Paksha is considered taboo like gram, lentil, cumin etc. Do not consume meat, fish and alcohol at all.

It is considered auspicious to use sesame during Shradh Paksha, meat and fish should not be eaten during Shradh, this angers the ancestors. Therefore, one who performs Shradh for ancestors should eat simple and sattvik food. Onion-garlic is also prohibited in Pitru Paksha, so the person who performs Tarpan should eat food without onion and garlic these days. With this, the person who performs Tarpan should not eat stale food, in Hinduism, three types of debt have been told,Loan, Rishi loan and Pitra loan. The importance of Pitru Paksha or Shradh in these three loans is because Pitru loan is considered to be the biggest debt. In the scriptures, to get rid of the debt of the ancestors, that is, Shradh Karma has been described. But you know who first performed the rituals of Shradh in Hinduism.

Description of Shradh method from Mahabharata period – Friends, at the time of Mahabharata period, Bhishma Pitamah has told many such things to Yudhishthira regarding Shradh, which very few people know at present. Today we are telling you some such interesting things related to Shradh – Maharishi Nimi started.In this way first Nimi started Shradh, after that other Maharishi also started performing Shradh. Gradually people of all the four classes started giving food to the ancestors in Shradh. The deities and ancestors were completely satisfied while eating the food of Shradh continuously. The ancestors had been suffering from indigestion, due to the continuous eating of Shradh, the ancestors got indigestion (not digested food) and due to this they started suffering. Then he went to Brahmaji and told him that after eating the food of Shradh, we have got indigestion, due to which we are suffering, please do our welfare.According to Mahabharata, the Pind Daan which is given for the ancestors after performing Havan in the fire, even Brahmarakshas do not contaminate it. Seeing Agnidev present in Shradh, the demons run away from there. First the father, after him the grandfather should then give the pind to the great-grandfather. This is the method of Shradh.While giving each pind, one should chant Gayatri Mantra with concentration and chant Somay Pitrumate Swaha. Mahalaya Amavasya Every year Bhadrapada • The period from Shukla Paksha Purnima to Ashwin Krishna Paksha Amavasya is called Pitru Paksha or Shradh Paksha. The last day of Pitru Paksha or Shradh is known as Sarvapitri Amavasya or Mahalaya Amavasya. This is how Pind Daan should be done According to Mahabharata, which is the law of three bodies in Shradh The first of them should be put in water. The second body should be left in the fire, this is the law of Shradh. One who follows it, his ancestors are always happy and satisfied.

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Hitesh

हितेश कुमार इस साइट के एडिटर है।इस वेबसाईट में आप छत्तीसगढ़ के कला संस्कृति, मंदिर, जलप्रपात, पर्यटक स्थल, स्मारक, गुफा , जीवनी और अन्य रहस्यमय जगह के बारे में इस पोस्ट के माध्यम से सुंदर और सहज जानकारी प्राप्त करे। जिससे इस जगह का विकास हो पायेगा।

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