महाशिवरात्रि की पावन कथा l holy story of mahashivratri

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हैलो दोस्तो मेरा नाम हैं हितेश कुमार इस पोस्ट मे आपको महाशिवरात्रि की पावन कथा के बारे मे जानकारी देने वाला हूं। यह जानकारी अच्छा लगे तो कॉमेंट और शेयर जरूर करे

महाशिवरात्रि की पावन कथा

दोस्तों भगवान शिव की उपासना का महापर्व शिवरात्रि है भगवान शिव की उपासना का पर्व महाशिवरात्रि इस वर्ष मंगलवार 01 मार्च 2022 को मनाई जा रही है । इस मौके पर लाखों श्रद्धालु शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग का रुद्राभिषेक करेंगे । बहुत से श्रद्धालु शिवरात्रि का व्रत करेंगे और रात्रि जागरण भी करेंगे ।

दोस्तों भगवान शिव में आस्था रखने वाले और महाशिवरात्रि का व्रत करने वाले लोग इस दिन शिवरात्रि की कथा जरूर पढ़ते या सुनते हैं। मान्यता है कि इससे भक्त की आस्था और ज्यादा मजबूत होती है, तो आइए पढ़ते हैं, महाशिवरात्रि व्रत की कथा

महाशिवरात्रि व्रत की कथा

दोस्तों शिव पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। दोस्तों वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका वह क्रोधित होकर साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। साहूकार के घर पूजा हो रही थी तो शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी।

दोस्तो शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने की बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। दोस्तों जब अंधेरा गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।

दोस्तों बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बेल पत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेल पत्र भी चढ़ गए। एक पहर में रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची।

दोस्तों शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। दोस्तों मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।’

दोस्तों शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया।

कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई।

तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली, ‘हे शिकारी!’ मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो ।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी । हे शिकारी! मेरा विश्वास करों, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।”

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके। किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिव जी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जान कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए।

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Hello friends, my name is Hitesh Kumar, in this post I am going to inform you about the holy story of Mahashivratri. If you like this information then please comment and share

holy story of mahashivratri

Friends, the great festival of worship of Lord Shiva is Shivratri, the festival of worship of Lord Shiva, Mahashivratri is being celebrated this year on Tuesday, March 01, 2022. On this occasion lakhs of devotees will go to Shiva temples and perform Rudrabhishek of Shivling. Many devotees will observe a fast on Shivratri and also do night awakening.

Friends, those who believe in Lord Shiva and observe the fast of Mahashivratri, definitely read or listen to the story of Shivaratri on this day. It is believed that this strengthens the faith of the devotee more, so let’s read the story of Mahashivratri fast.

story of mahashivratri fasting

According to friends Shiva Purana, in ancient times there was a hunter named Chitrabhanu. He used to feed his family by killing animals. Friends, he was indebted to a moneylender, but could not repay his loan on time, he got angry and took the hunter captive in Shivmath. Incidentally, that day was Shivratri. When the moneylender’s house was being worshipped, the hunter kept meditating and listening to religious things related to Shiva. He also heard the story of Shivratri fasting on Chaturdashi.

Friends, in the evening, the moneylender called him to him and talked about repaying the loan. The hunter was released from bondage the next day by promising to repay the entire loan. Like his daily routine, he went out for hunting in the forest. But due to being in the prison house all day, he was troubled by hunger and thirst. He went far in search of prey. Friends, when it got dark, he thought that he would have to spend the night in the forest. The forest waited for the night to pass by climbing a bael tree on the bank of a pond.

Friends, there was a Shivling under the Bel tree which was covered with Bel leaves. The hunter did not know about it, the twigs he broke while making the halt, they accidentally fell on the Shivling. In this way, the fasting of the hungry and thirsty hunter was also done throughout the day and Bel leaves were also mounted on the Shivling. At one time, after the night passed, a pregnant deer reached the pond to drink water.

Friends, as soon as the hunter drew an arrow on the bow, the deer said, ‘I am pregnant. I will give birth soon. You will kill two living beings at once, which is not right. Friends, after giving birth to a child, I will appear before you soon, then kill me.

‘Friends, the hunter loosened the line and the deer got lost in the wild bushes. While offering and loosening the thread, some Bilva leaves accidentally broke and fell on the Shivling. In this way, the worship of the first Prahar was also completed unknowingly from him.

The hunter let him go as well. He was perturbed over losing his prey twice. He was in all sort of thoughts. It was the last hour of the night. This time also some Bel leaves fell on the Shivling after being attached to the bow and the worship of the second Prahar was also completed.

Then another deer came out with her children. It was a golden opportunity for the hunter. He did not take long to shoot arrows at the bow. He was about to release the arrow when the deer said, ‘O hunter!’ I will return these children after handing them over to their father. Don’t kill me this time.

The hunter laughed and said, let me leave the victim who came in front, I am not such a fool. I have lost my victim twice before. My children must be suffering from hunger and thirst. In reply, the deer said again, just as you are harassing your children’s love, so is I. O hunter! Trust me, I promise to leave them with their father and return immediately.

Hearing the humble voice of the deer, the hunter felt pity on him. He let that chicken escape too. In the absence of prey and hungry and thirsty, the hunter was unknowingly sitting on the vine-tree, breaking the vine leaves and throwing them down. When the dawn came, a strong deer came on the same path. The hunter thought that he would surely hunt it.

Seeing the trunk of the hunter, the deer said in a humble voice, O hunter! If you have killed three deer and small children who came before me, then do not delay in killing me too, so that I may not have to suffer for a moment in their separation. I am the husband of those deer. If you have given life to them, then please give me life for a few moments. I will meet them and appear before you.

On hearing the deer, the whole night’s cycle turned in front of the hunter, he narrated the whole story to the deer. Then the deer said, ‘The way my three wives have gone as promised, after my death they will not be able to follow their religion. So just as you left him as a confidant, let me go too. I will appear before you soon with all of them.”

The hunter let him go as well. Thus morning came. Inadvertently, the worship of Shivaratri was completed due to fasting, night awakening and the offering of Bel leaves on Shivling. But he got the result of the worship done unknowingly immediately. The hunter’s violent heart was purified. The divine power resided in him.

After a while, the deer appeared before the family hunter, so that he could hunt them. But seeing such truthfulness, sattvikta and collective affection of wild animals, the hunter felt very guilty. He gave life to the deer family.

Even after unknowingly observing the fast of Shivaratri, the hunter attained salvation. When the eunuchs came to take away his creature in the time of death, the Shivaganas sent them back and took the hunter to Shivaloka. By the grace of Lord Shiva, King Chitrabhanu was able to remember his previous birth in this birth and after knowing the importance of Mahashivratri, he was able to follow it in the next life also.

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Hitesh

हितेश कुमार इस साइट के एडिटर है।इस वेबसाईट में आप छत्तीसगढ़ के कला संस्कृति, मंदिर, जलप्रपात, पर्यटक स्थल, स्मारक, गुफा , जीवनी और अन्य रहस्यमय जगह के बारे में इस पोस्ट के माध्यम से सुंदर और सहज जानकारी प्राप्त करे। जिससे इस जगह का विकास हो पायेगा।

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